शुक्रवार 19 जून 2026 - 16:36
भारतीय धार्मिक विद्वानों का परिचय | मौलाना सैयद काज़िम रज़ा रिज़वी

पेशकश: दनिश नामा-ए-इस्लाम, इन्टरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर दिल्ली

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इमाम-ए-जुमा खोजा जामा मस्जिद मुंबई, सदरे तंज़ीमुल मकातिब लखनऊ, वाइज़, मुसन्निफ़ मौलाना सैयद काज़िम रज़ा रिज़वी एक दयानतदार, उसूल पसंद, मुख़्लिस आलिम-ए-बाअमल और तहरीक-ए-दींदारी के अज़ीम सिपाही थे। आप की इल्मी व तब्लीगी ख़िदमात, खोजा मस्जिद की इमामत और तंज़ीमुल मकातिब के साथ वफ़ादारी आज भी याद की जाती है। आप का इल्मी व अख़लाक़ी विरसा आज के मुबल्लिग़ीन व औलमा के लिए मशअल-ए-राह है।

मौलाना सैयद काज़िम रज़ा रिज़वी इब्ने सैयद इबाद अली रिज़वी सन 1920 ईस्वी में रुदौली ज़िला बाराबंकी में पैदा हुए। आप का आबाई वतन मतेई ज़िला बाराबंकी था। आप के वालिद सैयद इबाद अली रिज़वी ने रुदौली में चौधरी सैयद इरशाद हुसैन मरहूम तालुकदार की कचहरी में अरसा दराज़ तक मुलाज़ेमत की। वालिदा की जानिब से आप का ताल्लुक़ ज़ैदपुर के मुअज़्ज़ज़ सादात ख़ानदान से था। आपको बचपन ही से दीनी तालीम व तरबियत का शौक था।

मौलाना ने इब्तिदाई तालीम अपने ननिहाल ज़ैदपुर में मौलाना बरकात अहमद ज़ैदपुरी से हासिल की। मूसूफ़ ने सन 1932 ईस्वी में बारह बरस की उम्र में सुल्तानुल मदरिस लखनऊ में दाख़िला लिया, जहाँ मौलाना सैयद मुहम्मद, मौलाना सैयद अब्दुल हुसैन, मौलाना आलिम हुसैन और मौलाना अल्ताफ़ हैदर जैसे जलीलुल क़द्र असातिज़ा से कस्ब-ए-फ़ैज़ किया।

सन 1944 ईस्वी में आप ने सदरुल अफ़ाज़िल की सनद हासिल की। बाद अज़ाँ मदरसा-ए-वाइज़ीन में दाख़िल होकर जय्यद असातिज़ा से कस्ब-ए-फ़ैज़ किया और सनद-ए-वअज़ हासिल की। इसी इदारे में आप की दोस्ती ख़तीब-ए-आज़म मौलाना सैययद ग़ुलाम अस्करी मरहूम से हुई, जो ज़िन्दगी भर क़ायम रही।

तालीमी फ़राग़त के बाद मौलाना काज़िम रज़ा रिज़वी ने वाज़ व तब्लीग़ के मैदान में क़दम रखा। मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों, क़स्बों और देहात में जा कर तब्लीग़-ए-दीन का फ़रीज़ा अंजाम दिया।

आप ना सिर्फ़ बाअमल आलिम व फ़ाज़िल थे बल्कि बेहतरीन वाइज़, मुक़र्रिर और मुसन्निफ़ भी थे। इस्लाह-ए-माशरा, अख़लाक़ी तरबियत और दीनी शऊर बेदार करने पर मबनी आप के मज़ामीन अक्सर मजल्ला “तंज़ीमुल मकातिब” और दूसरे रिसालों में शाया होते रहे।

“यादें बाक़ी हैं”, “तोःहफ़तुन निसा” और “अहकाम-ए-ज़िन्दगी व बंदगी” जैसे सिलसिले आप की क़लमी कोशिशों के मज़ाहिर हैं। मूसूफ़ के क़लम से दीनी व इस्लाही मौज़ूआत पर मुताअद्दिद मज़ामीन मंज़र-ए-आम पर आए। आप ने ख़तीब-ए-आज़म मौलाना ग़ुलाम असकरी ताबा सराह की दस मजलिसों पर मुश्तमिल मजमूआ “मजालिस-ए-,महदी” अपने जवाँ साल फ़रज़ंद निसार महदी मरहूम के ईसाल-ए-सवाब के लिए शाया किया। मौलाना की तहरीरों में सादगी, ख़ुलूस, बसीरत और दीनी हरारत पाई जाती थी।

मौलाना काज़िम रज़ा इदारा तंज़ीमुल मकातिब के बानी ख़तीब-ए-आज़म मौलाना ग़ुलाम अस्करी मरहूम के इब्तिदाई रुफ़क़ाए-कार में से थे। इदारे के क़ियाम से लेकर आख़िरी अय्याम तक मुख़्तलिफ़ हैसियतों से वाबस्ता रहे—मुबल्लिग़, इंस्पेक्टर, मुशीर, मजलिस-ए-इदारत के रुक्न। और अल्लामा सैयद ज़ीशान हैदर जवादी के इंतिक़ाल के बाद आप को इदारा तंज़ीमुल मकातिब का सदर मुंतख़ब किया गया। लेकिन बाज़ वुजूहात की बिना पर आप मुसताफ़ी हो गए, इसके बावजूद इदारे से आप की मुहब्बत व वफ़ादारी ता हयात बरक़रार रही। आप फ़रमाया करते थे: “मैं इदारे में नहीं हूँ, मगर इदारा अपनी जगह काम कर रहा है; उसका तआवुन करना है तो ख़ूब कीजिए।”

मौलाना सन 1974 से 1992 तक खोजा इस्ना अशरी मस्जिद मुंबई के इमामे जुमा रहे। आप के ख़ुत्बों में दीनी बसीरत, अख़लाक़ी क़ुव्वत और बेबाक हक़गोई नुमायाँ थी। मूसूफ़ हक़ के इज़हार में किसी से ख़ौफ़ज़दा नहीं होते थे; यहाँ तक कि किसी बड़े सेठ या बाअसर शख़्स को भी खुल कर टोकते। चाँद देखने के मसले में जब आप के नज़दीक शरई दलाइल मुकम्मल न थे तो अवामी दबाव के बावजूद एलान न किया; जब दलील साबित हुई तो फ़ौरन एलान फ़रमाया। यही इल्मी वक़ार और उसूल पसन्दी आप की शख़्सियत की नुमायाँ ख़ुसूसियात थीं।

मुंबई में दौरान-ए-इमामत आप ने नजफ़ी हाउस में तदरीस की, बाद अज़ाँ लखनऊ वापस आकर कुछ अरसा तंज़ीमुल मकातिब में भी तदरीसी ख़िदमात अंजाम दीं।

मौलाना निहायत क़नाअत पसन्द, ख़ुद्दार और बाउसूल शख़्सियत के मालिक थे। ज़िन्दगी में किसी क़िस्म की मसलहत या मफ़ाद परस्ती से दूर रहे। अपनी अहलिया की अलालत के वक़्त इंतिज़ामिया की माली मदद क़बूल न की बल्कि अपनी पेशगी तनख़्वाह से इलाज कराया।

ग़ुरबा नवाज़ी, यतीम परवरी और इमदाद-ए-मोहताजान आप के मिज़ाज का हिस्सा थी। मुताअद्दिद यतीम बच्चों की तालीम व तरबियत और किफ़ालत की, बहुत से नौजवानों को सहारा देकर बाइज़्ज़त ज़िन्दगी गुज़ारने का मौक़ा फ़राहम किया।

इन्किसारी व तवाज़ो भी आप के किरदार का जुज़्वे लाज़िम थी। तुल्लाब से मुहब्बत व शफ़क़त से पेश आते और उनकी सहूलत के लिए हत्तल-मक़दूर कोशिश करते।

मरहूम के दो बेटे और दो बेटियाँ थीं। एक फ़रज़ंद निसार महदी रिज़वी जवानी में ही इंतिक़ाल कर गए। एक बेटी का भी इंतिक़ाल हो चुका है। फ़रज़ंद मूसा रज़ा रिज़वी भी दार-ए-फ़ानी को छोड़ चुके हैं। अल्लामा की नस्ल में एक बेटी हयात हैं जो फ़ैज़ाबाद में मुक़ीम हैं।

ज़िन्दगी के आख़िरी बरसों में मौलाना रुदौली में मुक़ीम रहे। वहीं आप ने अपने तब्लीगी व इस्लाही मिशन को जारी रखा।

आख़िरकार यह इल्म व अदब का चमकता आफ़ताब 26 जनवरी 2010 ईस्वी को रुदौली ज़िला बाराबंकी में ग़ुरूब हो गया। हज़ार आहो बुका के साथ रुदौली में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।

माखूज़ अज़: मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-196 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024ईस्वी।  

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